( श्याम चौरसिया )
भारतीय चुनाव प्रक्रिया प्रणाली की रज मात्र भी समझ राहुल गांधी- नेता प्रतिपक्ष को होती तो केवल स्तरहीन दुकानदारी चलाने के लिए उलूल जुलूल, थोथे, स्तरहीन आरोप लगाने ओर फिजूल रायता फैलाने से बचते। अधकचरे ज्ञान से समर्थक चमचों को बहलाने,ओर भारत को गुमराह करने से बचते।
राहुल की नासमझी, अयोग्यता, से भारत का भले ही नुकसान न हो पर कांग्रेस के बचे खुचे जनाधार में बत्ती लग रही है। विश्वसनीयता की पुंगी बज रही है।
सवैधानिक स्वतन्त्र संस्था चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता पर कीचड़ उछालने से आप नेता केजरीवाल, टीएमसी नेता ममता बनर्जी, सपा चीफ अखिलेश यादव भले ही दीवाली मना ले। मगर उनकी नजर में भी कर्नाटक, तमिलनाडू, केरल, तेलंगाना, हिमाचल की बड़ी,एक तरफा जीत ओर बीजेपी की करारी हार की मिसाल है। यदि चुनाव आयोग निष्पक्ष, पारदर्शी नही है तो फिर कर्नाटक, तमिलनाडु,केरल, हिमाचल, तेलंगाना आदि सुबो में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों ने बीजेपी को धूल चटा दी। इन सुबो में चुनाव आयोग दाल गलाने में नाकाम क्यो रहा? इस लोकतांत्रिक यक्ष प्रश्न का कोई तार्किक, वैज्ञानिक, न्यायिक उतर किसी भी विपक्षी दल के पास न होना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी,मौकापरस्ती, को प्रमाणित करती है।
सनद रहे-भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त/ चुनाव आयुक्त, प्रदेशो के चुनाव आयुक्त केवल तयशुदा निर्देश देते है।नीतियां बनाते है। प्रोफार्मा जारी करते/ करवाते है।
नीतियों/ निर्देशो अमल करवाने ओर निर्धारित प्रोफार्मा भरने/ भरवाने का जिम्मा जिला/ तहसील स्थित निर्वाचन कार्यालय की बड़ी फ़ौज को होता है। ये फ़ौज कम से कम पांच स्तरीय ओर अधिकतम 09 स्तरीय होती है।
इन फर्मो की प्रविष्टियों की पूर्ति का जिम्मा हर वार्ड हर ग्राम पंचायत का बीएलओ निभाता है। बीएलओ ही अनेक बार घर घर जाकर दस्तक देकर मतदाताओं की वस्तु स्थिति/ जन्मपत्री खंगालता है। न कि मुख्य चुनाव आयुक्त/ चुनाव आयुक्त/ प्रदेशो के चुनाव आयुक्त । या जिला/ तहसील निर्वाचन अधिकारी ।
भारत मे ये हिमालय लाखों बीएलओ उठाते है। ये लाखो बीएलओ किसी एक दल या किसी एक विचारधारा के नही हो सकते। न किसी एक खूंटे से बंधे होते है। यदि प्रक्रिया में कोई भेदभाव/ विसंगति होती है तो बीएलओ के एक्सरे से बच ही नही सकती।
बीएलओ चुप रहने वाला नही बल्कि रायता फैलाने वाला जीव माना जा सकता है।
बीएलओ के हर क्रिया कलाप पर हर राजनीतिक दल के नेताओ,कार्यकर्ताओ की पैनी नजर रहती है। नेता/ कार्यकर्ता अपने समर्थक वोटरों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाले हेतु सहयोग करते है। हर राजनीतिक दल के सरदार, सदर, कोतवाल आदि चुनाव प्रक्रिया प्रणाली में जड़ तक जुड़े रहने की हिदायत/ नसीहत अपने अपने समर्थकों को देते है। नतीजन बीएलओ किसी भी तरह बेपटरी हो ही नही सकता। वजह। उसकी कार्यप्रणाली पर सीसीटीवी कैमरों की निगाह होना। चूक होते ही नेता तुरन्त तहसील/ जिला निर्वाचन अधिकारी को शिकायत कर सकता है। जिला/ तहसील निर्वाचन अधिकारी सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों से समय समय पर मीटिंग कर संवाद करते है। ताकि पारदर्शिता प्रभावित न हो सके।
मतदान प्रक्रिया भी आसान नही बल्की बहुस्तरीय होने की वजह से पूरी तरह पारदर्शिता वाली होती है। वह बात अलग है कि बंगाल की तरह मतदाताओं के साथ गुंडे मतदान के समय मारपीट करे। धमकाए। भीड़तंत्र के बूते सुरक्षा कर्मियों को हड़कए । गोलीबारी करके या आगजनी करके डराए। पर 2026 के बंगाल चुनावो में सुरक्षा बलों की सख्ती से ये अलोकतांत्रिक कर्म अंजाम देने वालो की दाल नही गल सकी।
यदि कोई पेंच,पोल होता तो बीजेपी केरल, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, हिमाचल, तेलंगाना में नही हारती। जाहिर इन सुबो में जनमत बीजेपी के पक्ष में नही था। कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों के पक्ष में था। नतीजन बीजेपी की नाक उतर गई। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त/चुनाव आयोग बीजेपी के एजेंट है तो फिर इन सूबों में बीजेपी निपट कैसे गयी। तमिलनाडु में तो खाता भी नही खुला। केरल में 02 विधानसभा सीटे हाथ लगी।
मुख्य चुनाव आयोग में दम होता तो झारखंड, तेलंगाना, हिमाचल,,केरल,तमिलनाडू कार्नस्टाक में भी गुल खिला सकते थे। नही खिला पाए। वजह जनमत का अटल,अचल प्रवाह।
2019 में 303 लोकसभा सीटे फतह करने वाली बीजेपी 2024 में 243 पर कैसे टसक गईं। 2019 में 55 वाली कांग्रेस कैसे 2024 में 99 पर जा पहुची।
इस चमत्कार का राहुल सहित अन्य दल डकार जाते है। भारत के सबसे बड़े सूबे उप्र मे सपा ने बीजेपी को 80 में से सिर्फ 35 सीटों पर पटक कांग्रेस के बाद लोकसभा में दूसरा सबसे बड़ा दल होने का खिताब हासिल किया। ये आंकड़े अपने आप मे विपक्षी नेताओं की हताशा, कुंठा, अलोकप्रियता, अयोग्यता, लगातार घटते जनाधार की चुगली करते है।
हकीकत राहुल ओर अन्य विपक्षी नेता अपनी नाकामी,निकम्मेपन, दोगलेपन,अलोकप्रियता,अयोग्यता का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ पतली गली से बच निकलना चाहते है। लेकिन ये यह नही जानते, समझते कि भारत हर बात को नापता है तोलता ओर परखता है। उसके बाद फैसला लेता है।
भारत अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति गम्भीर/ चेतन्य/ जागरूक है।
भारत राहुल और अन्य विपक्षी नेताओं के रायते में डूबने की बजाय रायते की जलजीरा बनाना जनता है।
