(श्याम चौरसिया )
वसंत ऑटो के इंतजार में 10 मिनिट से तीन बत्ती चौराहा पर खड़ा खड़ा झुंझला उठा। 02 दर्जन से अधिक ऑटो को रोकने की कोशिश नाकाम रही थी। कोई नही रुका। नाहक ट्रेन से आया। कार ले आता तो मर्जी के मालिक रहते। भोगना नही पड़ता। वसंत अपनी गलती पर खीज रहा था।
तभी एक स्कूटी सवार युवती ने वसंत के पास स्कूटी रोक कहा- अंकल आप यहाँ? पहचान न पाने के कारण वसंत अचकचा गया। युवती ने वसंत की मनोदशा भांपने में देर नही की। अरे ! अंकल मैं यशोदा जी की बेटी पूर्णिमा।वसंत को तुरंत सब याद आ गया। यशोदा 07 साल पहले काम छोड़ चुकी थी। तब से उसकी कोई खोज खबर नही मिली थी। वसंत सुखद आश्चर्य में डूब गया। यशोदा नेक,ईमानदार,वफादार सेविका रही। उसने 14 साल से ज्यादा वसंत के परिवार का ख्याल रखा। आनंद के जन्म के समय यशोदा ने लक्ष्मी की खूब देख भाल की थी। तब पूर्णिमा 02 साल की रहीम होगी। पूर्णिमा वसंत के घर मे खूब उछल कूद करती रहती थी। वसंत ने ही जोर देकर पूर्णिमा को स्कूल में भर्ती करवाया था। ताकि वह यशोदा का संस्करण बनने की बजाय अपने उज्ज्वल भविष्य को सवार सके।
पूर्णिमा ने यशोदा को वसंत के चौराहा पर खड़े होने की खबर दी। यशोदा ने वसंत से अपने घर मे ही रुकने,ठहरने का विन्रम आग्रह करते हुए कहा- साहब ! महंगे होटल जैसा सुख तो नही मिल सकता । मगर घर जैसी सेवा पाकर आप का जी भर उठेगा। इस पारिवारिक आग्रह ने वसंत को विवश कर दिया।
एक रूम, किचन के छोटे से सजे सवरे घर मे प्रवेश करते ही वसंत को अभावों से भरा बचपन याद आ गया।
यशोदा काम से लोटी नही थी। पूर्णिमा ने चाय नाश्ता कराने के बाद वसंत के बैग से सामान निकाल अलमारी में जमा दिया।
वसंत पूर्णिमा की स्कूटी लेकर राजवाड़ा चला गया। असल मे पूर्णिमा ने ही टेक्सी की बजाय स्कूटी से जाने की जिद्द की थी। ताकि समय जाया न हो सके।
यशोदा ने थाली परोस दी।भोजन करते समय वसंत ने संकोच से कहा- आप लोगो को बहुत असुविधा होगी। यशोदा ने तुरंत कहा- घर नही मन बड़ा होना चाहिए। जब हम छोटी सी फूस की झोपड़ी में 08 जने गुजारा कर सकते है तो अब भगवान के आर्शीवाद से सजा संवरा घर है। आपके लिए पलंग है। हमे पहले से ही जमीन पर सोने की आदत है।
इस अलौकिक पारिवारिक व्यवस्था में कब कैसे 08 दिन गुजर गए। वसंत को पता ही नही लगा। काम की थकान मिटाने के लिए वसंत ने धार- मांडू, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मंडलेश्वर आदि घूमने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव सुन पूर्णिमा खुश हो चहकने लगी।
मांडू की प्राकृतिक दृश्यावली पर मोहित हो पूर्णिमा ने 02 दिन रुकने की जिद्द पकड़ ली। महेश्वर में भी पूर्णिमा की जिद्द के आगे यशोदा को हथियार डालने पड़े।
यशोदा ये महसूस कर रही थी कि पूर्णिमा वसंत पर जरूरत से ज्यादा हक जता रही थी। हठ और जिद्द पर अड़ जाने पर वसंत खुश होकर पूर्णिमा को रूठने नही देता।
मांडू की तरह महेश्वर में होटल में रुकने की बजाय धर्मशाला में ठहरे। एक रम मुश्किल से मिला।