( श्याम चौरसिया)
अभी तक बम्पर घोटालो, फर्जी ख़रीदी, फर्जी भुगतान , घूसखोरी,भाई भतीजावाद के रूप में phe, pwd, जल संसाधन, आदिम जाति कल्याण विभाग, सामाजिक न्याय विभाग,राजस्व विभाग आदि ही कुविख्यात माने जाते रहे है। लेकिन नगरीय निकाय विभाग के अति जिम्मेदार अफसर संजय दुबे ने अपने ही विभाग की करतूतों, कारनामो, फर्जीवाड़े को बेपर्दा करके सनसनी फैला बेदाग शासन का दावा करने वाले cm डॉक्टर मोहन यादव की हवा निका कटघरे में खड़ा कर दिया। प्रतिपक्षी नेता जीतू पटवारी ने आईएएस संजय दुबे की बेबाकी के बूते cm सहित सारे निजाम पर निशाना साध जम धन की लूट के गम्भीर आरोप लगाए। cm, मंत्री बागरी को कटघरे में खड़ा कर दिया।
आईएएस संजय दुबे के मुताबिक 02 लाख की कचरा गाड़ी 06 लाख, 05 रुपये की फिनाइल 36 हजार, 350 की एलईडी 11 हजार, एलम, आदि वस्तुएं भारी और ऊंची दर में खरीदने का खुलासा किया है। इस खुलासे की जड़ में है- डिजिटल ऑडिट।
भोपाल नगर निगम सहित अन्य नगर निगमो, नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों में की गयी 1150 करोड़ की ख़रीदी के तुलनात्मक डिजिटल आडिट में ये बम्पर घोटाला पकड़ में आया पहली नजर में 250 करोड़ के बदले 1150 करोड़ चुकाना माना जारहा है।आईएएस संजय दुबे ने इस घोटाले को सार्वजनिक रूप से नही बल्कि सुंदर लाल पटवा एकेडमी में सम्पन्न नगर निगम आयुक्तों,नगर पालिकाओं के सीएमओ, महापौरों,अध्यक्षो की मीटिंग में बेपर्दा करके आयना दिखाया।
इस सनसनी खुलासे के बाद विभागीय राजमंत्री श्रीमती बागरी ने सफाई में गले न उतरने वाले तर्क दिए। इसी तरह से भोपाल नगर निगम की महापौर श्रीमती राय ने सारा ठीकरा आयुक्त, उपायुक्तों पर फोड़ अपने पद, पावर का बचाओ किया। इस गंभीर मामले में प्रदेश के चर्चित,दमदार नगरीय निकाय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के अभी तक जबान नही खोलना रहस्यमयी लगता है।
अंदर खाने की माने तो जनप्रतिनिधियों ने स्थानीय निकायों को आर्थिक दोहन का अखाड़ा बना रखा है। पार्षद से लेकर हर दमदार नेताओं के वाहनों को खुराक सुलभ कराने का जिम्मा नगरीय निकाय सीएमओ, इंजीनियरों,ठेकेदारों का है। कुछ अध्यक्ष तो अपने निजी खर्चो,मांगलिक अवसरों का बोझ सीएमओ,इंजीनियरों पर लादने में माहिर माने जाते है। सीएमओ का प्रभार लेने के लिए एक मुश्त कमसे कम 10 लाख, तबादले के लिए 05 लाख, अदने से कर्मचारी को अपना तबादला कराने के लिए 04 लाख, अस्थाई से स्थाई पद बदलाव के बदले कम से कम 02. लाख, लाभ दायक शाखा पाने के बदले कम से कम 01.25 लाख का रेट फिक्स बताया जाता है।
अनेक स्थानीय निकाय पर कर्मचारियों का 06-08 माह का वेतन बकाया चल रहा है। इसके बाबजूद जिम्मेदार अधिकारियों- कर्मचारियों का जीवन मौज में किस बूते बीत रहा है। ये जांच का विषय भले हो। पर हकीकत ये है कि जनता से सीधे जुड़ाव रखने वाली स्तानीय निकायों में नामांतरण, नल कंनेक्सन, pm आवास, भवन निर्माण मंजूरी, राशन कूपन बनवाने आदि और गंभीर आपसी विवादों को टालने,दबाने के रेट फिक्स है।
एक जिम्मेदार सेवा निवर्त सीएमओ ने आईएएस संजय दुबे की बेबाकी को सही,उचित बताते हुए कहाकि यदि सीएमओ एडजेस्टमेंट न करें तो वह 04 दिन भी पद पर नही रह सकता। सीएमओ को आयुक्त कार्यालय से लेकर स्थानीय सत्तारूढ़ दल ओर दमदार विपक्षी नेताओं की चिलम भरनी पड़ती है। न भरे तो कुर्सी गयी।
एक विरोधाभास भी देखने मे आया। जिन स्तानीय निकायों के अध्यक्ष- सीएमओ मजबूत है। उन पर आयुक्त कार्यालय की कृपा रहती है। वे केवल 05% के लगभग चढ़ोत्तरी अर्पित करके ठोस,दीर्ध जीवी, बेहत्तर गुणवत्ता के टिकाऊ निर्माण कार्य करवा जनता को सकूं देते है। लेकिन स्थानीय निकायों को कामधेनु समझने वाले अध्यक्ष- सीएमओ की नीति, नियत चर्चित होते ही आयुक्त कार्यालय की हर टेबल मुह फाडे रहती है। नतीजन ये 30-40 % जीमने वाले की पंगत मेँ शामिल कर दिए जाते है। जिसका दुष्प्रभाव बेहद घटिया जन निर्माण कार्यो में देखने मे आता है। ये केवल कागजी खाना पूर्ति करके सरकार और जनता को चूना लगाने में माहिर माने जाते है।
बहरहाल आईएस संजय दुबे ने बड़बोले cm डॉक्टर मोहन यादव के दावों की हवा निकाल निजाम और अपने चेलों को नीति नियत सुधारने की चुनोती दी है।
हो सकता है। आईएस दुबे को अपनी इस बेबाकी की कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। निजाम तो हर हाल में निजाम ही होता है।
