
( श्याम चौरसिया )
अगला स्टेशन पार करते ही स्वाति ने जुगल परिवार के आथित्य में कमियां/खामियां गिनाने का नारीत्व पिटारा खोल दिया। कुछ देर कुनेन खाने के बाद विपुल को आखिर मित्र जुगल की रक्षा के लिए वाणी फरसा उठाना ही पड़ा।
उसके सब बच्चे बाहर है। कोई सर्विस कर रहा है तो कोई पढ़ रहा है। पति-पत्नी का स्नेह भर संग। जितनी जरूरत उतना खाना- सब्जी बना ली। तुम्हे/ हमें खाना- सब्जी कम पड़ी क्या? नही न! क्यो फिजूल दिमाक खपा यात्रा के आनंद को कसैला बना रही हो।
वाचाल स्वाति अपनी बात का कड़ा उत्तर पा खिन्न और उग्र हो उठी। मुझ से तो 04 लोगो का इतना कम भोजन बन ही नही सकता। सेला भी तो होना चाहिए।
सबने भर पेट भोजन किया या नही? कम पड़ा? नही। ओर सेला या अन्नपुर्णा किसको कहेंगे?
स्वाति को अपना वार खाली जाना नागवार लगा। वह उबल पड़ी। मुझे पता होता तो कभी नही जाती। 04 घण्टे स्टेशन पर ही काट लेती।
विपुल से मित्र जुगल का अपमान बर्दास्त नही हुआ। वे हर वस्तु की कीमत जानते है। जुगल अभावों से संघर्ष करके आज शिखर पर पहुचा है। वह ओर भाभी भोजन या अन्न, प्रकृति का सम्मान करते है। अपमान नही। फिजूल फेकने या फ्रिज में रख सड़ाने के लिए नही बनाते। वे जानते है। बासी भोजन सेहत के अनुकूल नही हो सकता। दवाओं में रुपए फूंकने और डॉक्टरों के फेरे लगाने से तो अच्छा हे, पहले बिंदु पर ही नियंत्रण करके स्वास्थ और धन का सदुपयोग कर लिया जाए।
स्वाति इस करारी चोट से तिलमिला उठी। वजह। स्वाति ने 30 साल में कभी जरूरत मुताबिक भोजन बनाने की बजाय इतना ज्यादा बनाती है कि पड़ोसियों को हांक लगा देना पड़ता है। न दे तो खराब होना नक्की। अन्न का अपमान।
शादी- विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर हलवाई को तय लिस्ट से ज्यादा सब्जी,भोजन बनाने के लिए बाध्य करने से नही चूकती। बचने पर दाल- सब्जी तो गर्म मौसम में खराब हो जाती। भोजन ठिकाने लगाने के लिए विपुल ओर उसके साथियों को सब काम छोड़ दौड़ धूप करना पड़ता। तब कही जाकर चेन मिलता। मगर मजाल स्वाति सबक ले टांग अड़ाने की आदत से बाज आ जाए। इस फिजूल बेकद्री को लेकर स्वाति ओर विपुल में बहस भी हो जाती। स्वाति की गर्जना और कुतर्को के बचने के लिए विपुल चलता बनता। पर स्वाति की गर्जना पर विराम नही लगता।
तीन स्टेशन पार करने के बाद भी स्वाति का भोजन कांड बंद न होने पर विपुल चादर तान सीट पर सोने की कोशिश करने लगा। सोते सोते सोच रहा था। नाहक जुगल को तकलीफ दी। एक तो वह स्टेशन लेने और फिर छोड़ने आया। मित्र आथित्य में कोई कमी नही रखी। बचपन ओर लड़कपन की यादों में कब चार घण्टे बीत गए। पता ही नही लगा।
जुगल जैसे परम मित्र के आथित्य पर उंगली उठाने के बाद बतौर सबक किसी अन्य के मित्र के घर स्वाति को ले जाने से विपुल परहेज करने लगा। विपुल खुद चला जाता। चाहे वह पारिवारिक या मांगलिक अवसर हो। वजह। सुविधा भोगी स्वाति मित्रता की कीमत ही नही जानती।
