( श्याम चौरसिया
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सनातन का एक मात्र महापर्व- वार्षिक कुंभ। जिस पर सारा भारत बाजार में उमड़ पड़ता है। बाजारों में तिल रखने की जगह नही। दुकानों पर होती जबरजस्त ग्राहकी से किसी को मोल भाव,तोल करने की फुर्सत नही। कमाने- गवाने का दिलचस्प सिलसिला। शोर में शांति। तनाव में प्रेम। सद्भाव। आनंद।समभाव।
सर्वत्र पूजा। हर भारतीय केवल केवल पुजारी।
लक्ष्मी साधक। लक्ष्मी की आराधना का ज्योति पर्व।उल्लास गंगा में हर कोई,बिना किसी आमंत्रण के स्नान करता दिखता है।
अनुशासन भी ऐसा कि खुद अनुशासन शर्मा जाए। मजाल! ठसाठस भरे बाजार में किसी को खरोच आ जाए। सब एक दूसरे की सुविधा का ध्यान रखते। दूरियां नजदीकियों में बदल जस्ती है।
सब स्वप्रेरणा से संचालित। यंत्रवत। मिल लिए तो राम राम। न मिले तो कोई शिकवा शिकायत नही। दिक्कत नही। सब अपने मे मस्त। मौज में।
न नर न मादा का भेद। मजाल भीड़ में किसी के माब सम्मान, गरिमा को ठेस पहुच जाए। अहिंसा का साम्राज्य। अखंड,अटल साम्राज्य।
यदि गैर सनातनी पर्व होता तो सड़के,नालियों लहू से पट जाती। आंखों में प्रेम,सद्भाव का प्रशांत नही बल्कि हिंसा,नफरत,कट्टरता मक्कारी, स्वार्थ का अरब का बह रहा होता। भय से खिड़कियां खुलने में झिझकती। डरती। सवाल करती। ये कैसा पर्व है। जो समाज को दो हिस्सों में बांट देता है। दरारें पैदा कर देता है। अपनी हिंसात्मक इच्छाएं थोपता है।
सड़के धूजती। बस भूकम्प ही नही आता।
एक दीपावली है। जिस पर सड़के गर्व महसूस करती है। कमल खिलाती है। खिड़कियां खुली रहती है। दरवाजे बंद करना ठीक नही माना जाता। न कोई डर। न कोई भय।
सर्वत्र उजियारा। सब के लिए मंगल कामनाएं।
स्वागत सत्कार,अभिनंदन की गंगोत्री । मंगल। मंगल ही मंगल।
