
( श्याम चौरसिया )
भोपाल की कोख में बसे अब अन्नपुर्णा में बदल चुके राजगढ़ के ब्यावरा में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक के मुख्य आथित्य में बुजुर्गों को समर्पित प्रेरक, अनुकरणीय संम्पन्न समारोह ने बुजुर्गों को अपनेपन,बचपन की याद दिला दी। श्री खटीक ने सामाजिक न्याय को गति देते हुए खुद बुजुर्गों से रूबरू होते हुए उनकी पीड़ा,अनुभव, संवेदनशीलता, रचनात्मकता, कौशल को साझा किया। उंन्हे मंच पर आमंत्रित करके उन्हें सुना। परखा। तोला।
श्री खटीक ने समाज मे बुजुर्गों की महिमा,योगदान, सेवा,त्याग को व्यवहारिक तरीक़े से रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक भारत पश्चिम से मोहग्रस्त रहेगा तब तक बुजुर्ग सम्मान के लिए तरसते रहँगे। उसी मोह की देन वर्द्धाश्रम है। इन आश्रमो में रहने वाले अधिकांश की संतानें उच्च पदस्त होते हुए भी सन्ताने अपने माता पिता की न सेवा कर पाते है। न सम्मान। नतीजन आश्रमों में घुट कर रह जाते है। वे झूठी यादों में जीते है। जबकि भारत की विराट संस्कृति में बुजुर्ग के अनुभवों का आदर किये जाने की व्यवस्था है। उनके हवाले नाती- पोतों को करके उन्हें राष्ट् सेवा में लीन रहना चाहिए। नाती-पोते दादी, दादा,नानी- नाना से जितनी सहजता,अपनत्व से सीख साहसी, आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी, बनते है। उतने अपने गुरु से भी नही बन पाते।
श्री खटीक ने प्रसाशन को सबल,अनुभवी बुजुगों के ज्ञान,कौशल के दोहन की नसियत दी।
श्री खटीक ने 58 अपंगों को सायकल, आवश्यक किट प्रदान करते हुए कहाकि उनका मंत्रालय 12.28 लाख अपंगों को किट प्रदान करके उन्हें सबल बना चुका है।
राजगढ़ का समाजिक न्याय विभाग केंद्रीय मंत्री की आंखों में धूल झोंकने से भी नही चुका। बतौर टोकन 05 जिन अपंगों को महंगी ट्रायसिकल भेंट की थी। उनमें से 02 महिलाएं उन ट्राय सिकलो को चलाने की बजाय किसी स्वस्थ की तरह धकाती हुई ले जाती हुई देखी गयी। यानी क्वांटटी बढ़ाने के फेर में क्वालिटी की उपेक्षा असल हकदारों के हक पर डाका डालने के तुल्य था।
इस अनूठी सामाजिक, प्रसाशनिक पहल से उपेक्षित समझे जाने वाले तबके में सदभावना, आत्मीयता,समरसता का संदेश गया। केंद्रीय मंत्री ने प्रसाशन को इस तरह के आयोजन मंडल स्तर पर करने की हिदायत दी।
इस कारगर आयोजन को सफल बनाने में बतौर प्रमुख अथिति सांसद रोडमल नागर, राज मंत्री गौतम टेटवाल, नारायण सिंह पंवार, विधायक हजारीलाल दांगी, कलेक्टर, एसपी सहित अन्य जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, विद्यार्थियों, बुजुर्गों का सराहनीय योगदान रहा।
