
( श्याम चौरसिया )
विशेषज्ञ बुजुर्ग किसान तक दिसबंर मध्य में नलकुपो, कुओ के टे बोल जाने से हैरत में है। इस विषमता/ विडंबना की नोबत फरवरी तक ही आ पाती है। मगर इस साल भरपूर बारिस के बाबजूदजल स्त्रोतों के असमय,अकाल अगूंठा दिखाने से रवी फसलों, गेंहू, मसूर का उत्पादन संकट में फंसा दिखने से किसानों की सुखद उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है। यदि मावठा बरस जाता है तो डूबती रवी फसलों को जीवन मिल सकता है।
शाजापुर, आगर, विदिशा के लेट री, भोपाल के बैरसिया -नजीराबाद, सीहोर,गुना के चाचौड़ा, राघोगढ़, राजस्थान के झालावाड़ में नलकूपों, कुओ से सिंचाई पर निर्भर रवी फसलों के
उत्पादन पर संकट बहुत ज्यादा है। नहरों पर निर्भर खेतों के गुलजार रहने की संभावना है।
रायड़ा, सरसों के उत्पादन पर शायद कोई प्रभाव न पड़े।क्योकि ये फसलें पकने की कगार पर लगती है।पर गेंहू में अभी 02 पानी निकले है। कही कही 03 पानी भी निकल चुके है। मगर नलकुपो,कुओं के हाथ ऊंचे कर देने से बाकी की 02-03 सिंचाई के अभाव में फसलें सूखती दिख रही है। जाहिर उत्पादन प्रभावित होना नक्की है।
राजगढ़, भोपाल,आगर, गुना, शाजापुर जिलों में दर्जनों बड़े, माध्यम डेम है। सैकड़ो लघु बांध है। इस समय वे लबालब है। वजह। बारिस 40 के मुकाबले 60 इंच के लगभग होना है। राजगढ़,आगर, शाजापुर, विदिशा, भोपाल में मोहनपुरा, कुंडलिया, पार्वती,रेसाई जैसे बड़े बांधों के होने का लाभ जल स्तर ऊंचा उठाने में लेस मात्र न मिलना चिंताजनक और शोध का विषय है। प्रचुर जल राशि के होते हुए फसलें पानी के लिए तरसने लगी। किसान परेशान है। हैरान है। चिंताग्रस्त है। किसानों की उम्मीदें बलि लेते दिख रही है। खरीब फसलें अतिवर्ष्टि ने पहले ही लील किसानों की आर्थिक कमर तोड़ दी थी । यदि खरीब की तरह रवी ने भी अंगूठा दिखा दिया तो किसान उभर नही पायेगा। किसानों का मनोबल टूट जाएगा। खेतो से मोह भंग भी हो सकता है।
ये तो गनीमत है। कड़ाके की ठंड और ओस की वजह से गेहूं,मसूर की फसलें अभी तक जिंदा,हरी है। वाष्पीकरण थम सा गया है। यदि मौसम करवट ले लेता है तो सब कुछ आंखों के समाने ही तबाह हो सकता है। किसान इस समय अच्छे मावठे बरसने की माला जप रहा है।
जो नलकूप,कुए फरवरी तक दम मारते थे। वे प्रचुरतम बारिस के बावजूद दिसम्बर मध्य में ही किन कारणों से पेंदे दिखाने लगे? ये जांच का विषय हो सकता है। ये भी सच है। किसानों में नलकुप खनन की होड़ पिछले 01 दशक से लगी हुई है। जिन किसानों ने सरकार की अमृत धारा योजना में , बलराम तालाबों में बत्ती दी। उनमें से 95% किसानों ने नलकूप खनन की सरकारी सब्सिडी पर भी हाथ साफ करके सरकारी जन धन बनाम खजाने की पुंगी बजा डाली। अब उनकी बांधो पर निगाह है।
भरपूर बिजली है। मगर सिंचाई के लिए नलकुपो,कुओ में माकूल पानी नही बचा। पानी है तो रो रो कर खेत के किसी टुकड़े को ही सींच पा रहे है। पूरे खेत को सींच लदी फसल को बचाने की चिंता है।बस आस अच्छे मावठे पर है।
