
( श्याम चौरसिया)
कभी एसडीएम जैसे रसुखदार पद पर आसीन रहे सत्ता के हुक्म पर नचाने वाली निशा बाँगरे को राजनीति का नशा ले डूबा। वे न घर की रही न घाट। राम मिलना तो दूर माया भी आंख दिखा गयी। लअब वे फिर से सरकारी सेवा में आने के लिए छटपटा रही है। मगर रणनीति में हाथ आजमाने की ललक ने मंसूबो पर पानी फेर दिया।
2018-19 में एसडीएम जैसे कामधेनु पद पर रहते हुए बैतूल में पद यात्रा निकाल जनसमर्थन जुटा कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को रिझाने में कसर बाकी नही रखी। नाथ ने भी आहुतियों का मुआवजा अमला सीट से चुनावी जंग में कूदने का इशारा कर दिया। इशारा पाते ही बाँगरे ने सरकारी सेवा पर लात मार दी। मगर नाथ ने अंगूठा दिखा दिया। कांग्रेस की किसी लिस्ट में बाँगरे का नाम नही छपा। ओर आमला सुरक्षित सीट से किसी ओर ने बाजी मार बाँगरे के तोते उड़ा दिए। नाथ ने एक न सुनी। किए गए वायदे से मुकरने के आरोप का जबाब नाथ ने ये कह कर दिया कि अभी लोकसभा चुनाव बाकी है।
बाँगरे को लोकसभा चुनाव में भी टिकिट नही दिया। नतीजन बाँगरे को कांग्रेस प्रवक्ता का लॉलीपॉप थमा चुप कर दिया
ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाला बदल केशरिया थाम लेने से नाथ सरकर मझधार डूब गई।
पिछले 7-8 सालों में बाँगरे का विश्वास और मोह भंग हो गया। वे सरकारी सेवा में वापसी के लिए तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान और मौजूद सीएम मोहन यादव से भी मिल चुकी। मगर वापसी में उनका त्यागपत्र रोड़ा साबित हो रहा है। सामान्य प्रशासन विभाग राजी नही हो रहा है।
बाँगरे रसूख,रुतबे भरे दिनों को याद करके समय काटने के लिए लाचार है। नाथ के वायदों ने बाँगरे के उज्ज्वल भविष्य पर पानी फेर न उन्हें घर का न घाट का रहने दिया।ये सबक कितने लोग ग्रहण करते है?
