(श्याम चौरसिया )
सनातन की आदि और अनंत परम्परा का दैवीय, दिव्य,भव्य पालन का दृश्य पितृ पक्ष में साकार हो उठता है। पितरों,पुरखो की स्मृति में हर सनातनी दाब अंगुलियों में फंसा विधि विधान से अर्ध अर्पित करता है। पंडित मंत्र पढ़ते है। नदियों,निर्धारित घाटों पर पंडित ये अनुष्ठान बिना किसी लोभ लालच के सम्पन्न कराते है। दक्षिणा दे तो भला। न दे तो भला।
पुरखो की स्मृति में उनकी निर्धारित पुण्य तिथि के हिसाब से श्राद्ध किया जाता है। भोग लगाया कर धुनि/धूप दी जाती है। फिर अंतरिक्ष को आव्हान करके ससम्मान कौवों का आमंत्रित करते है। माना ये जाता है। कोबे ही पुरखो तक आस्था,श्रद्धा, भोग के वाहक होते है। वे ही पुरखों को तृप्त करते है। कौवों को कराया गया भोजन सीधे पुरखे ग्रहण करते है।
आज के वैज्ञानिक युग में तर्क की कसौटी पर ये आस्था युक्त कर्म भले ही कम गले उतरे। मगर वैदिक विधान के मुताबिक पितृ पक्ष में पुरखे अपने आश्रितों, वंशजो, खानदान की सेवा लालसा में अधीर हो उठते है।
पुरखों को तीन साल तक विधिवत अर्ध अर्पण और श्राद्ध का अधिकारी नही मानने का विधान है। दाह संस्कार के तीसरे साल उनको श्राद्ध में शामिल करने के लिए पितर मिलोनी अनुष्ठान किया जाता है। हर परिवार अपने हैसियत के अनुसार इस अनुष्ठान में परिजनों,परिचितों को आमंत्रित करता है। ये पितर मिलोनी अनुष्ठान प्रायः पूर्णिमा, अमावस्या को सम्पन्न कराने का विधान है। इस विधान में क्षेत्र के अनुसार फेर बदल आम है। कही कही ये विधान पुरखो की मृत्यु तिथि पर भी किए जाते है। इस अनुष्ठान में खानदान के हर जन की भागीदारी अनिवार्य मानी जाती है। वे यज्ञ, धूप, आदि करने पितृ का आव्हान करके अपनी गलतियों की क्षमा मांगते है।
पितृ पक्ष में बिहार के गया की फल्गु नदी किनारे पूरे भारत से लोग अपने पुरखों का बिधि विधान से तर्पण,श्राद्ध करने जाते है। ताकि पुरखो को नश्वर संसार से मुक्ति मिल सके। तर्पण हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में भी मान्य माने जाते है
