
(श्याम चौरसिया )
भारत मे हर मौसम, पक्ष को आस्था, धर्म, समाज,राष्ट्र , प्रकृति से जोड़ने की अटूट,अचल,अटल रचनात्मक कला कल्पनाएं स्वतः अंगड़ाइयां लेती है। बस पर्व आने दीजिए। किशोर,किशोरियों चैतन्य, जागरूक।
भारत मे रक्षा बंधन से ही पर्वो का सिलसिले का श्री गणेश हो जाता है।
जिस श्राद्ध पक्ष में शुभ,मांगलिक कार्य कम होते है। आभूषणों, वाहनों इलेक्ट्रिक आदि वस्तुओं की खरीददारी गोते लगा जाती है। उसी श्राद्ध पक्ष में कुमारिया दीवारों को गोबर से लीप अपनी नैसर्गिक कल्पना से धर्म, प्रकर्ति को समर्पित मांडने उकेर अपनी सहलियो पर धाक जमाती है। उन्हे प्रेरित करती है। एक होड़ सी लगी रहती है।
घर पक्के हो जाने और मशीनें जिंदगी ने शहरों में इस कला के दर्शन दुर्लभ से है।लेकिन ग्रामों ने इस कला को जिंदा रखा हुआ है।
ग्रामीण किशोरियों भोर होते ही गोबर , रंग बिरंगी पन्निया जुटा संझा ओली मांडने जुट जाती है। एक संझा औली की उम्र 23 – 24 घन्टे से अधिक नही होती। ये कर्म पूर्णिमा से अमावस्या तक चलता है। अमावस्या को विधिवत किसी कुंड, नाले, नदी में संझा औली की सामग्री समर्पित करने खुद उत्साहित किशोरियों का झुंड जाता है। मंगल गीत गाते हुए।
