( श्याम चौरसिया)
बिहार विधान सभा चुनावों में तमाम उलूल जलूल असंसदीय, अभद्र, शर्मनाक कसरतों के बाबजूद कांग्रेस-लालू सहित इंडी गठबंधन को बिहारियों ने धूल चटा औकात दिखादी। जैसे पानीपत की जंग अहमद शाह अब्दाली से हारने के बाद मुगलों- मराठों को रण कमियों का बुद्धतत्व प्राप्त हुआ था। वैसी ही दशा तेजस्वी-लालू परिवार और ईडी गठबंधन की हो चली। लालू कुनबा यादवी संघर्ष में झुलस, खदबदाने लगा। तेज प्रताप सिंह यादव पहले ही लालू, राबड़ी किले को टाटा कर चुके थे। बहन रोहणी आचार्य सहित 02 अन्य बहनों ने तेजस्वी के अभद्र, अमर्यादित रवैये से दुखी हो कर राबड़ी- लालू से पल्लू/दामन छुड़ा,पारिवारिक मर्यादा, स्वाभिमान को रक्षा की।
लालू पार्टी ही नही बल्कि इंडी गठबंधन छिन्न भिन्न हो गया। ada की सुनामी में जमीन ऐसी हिली की बंगाल की ममता के मंसूबो पर पानी फिर गया। बिहार ने sir ओर चुनाव आयोग के सुधारात्मक अभियानों पर मोहर लगा दी।
ममता खिसियानी बिल्ली की तरह sir लागू करने पर बगावती तेवर भले ही दिखा ले मगर अवैध घुसपैठियों में मची वापसी की भगदड़ को ममता के बगावती तेवर भी रोक नही पा रहे है। सदूर तमिलनाडु,केरल तक मे बरसो से बसे घुसपैठिये, मालदा, उतरी चोबीस परगना सहित अन्य चेक पोस्टों पर जमा हो बंगला देश वापसी की जुगाड़ में लगे है। बंगाल, झारखंड के तो है ही।
असल मे करोड़ो घुसपैठियों को लगने लगा कि ज्यादा दिन ममता बैनर्जी प्रतिरोध नही कर पायेगी। उंन्हे सही साबित करने के लिए तो कागज दिखाने ही होंगे। फजी,जाली आधारकार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड बचा नही पाएंगे। चोरी पकड़ी जाएगी। दंड होगा। बेइज्जती होगी। नर्क यात्रा करनी होगी।
नतीजन बंगलादेशी जैसे, जिस रास्ते से भारत मे घुसे थे। उसी रास्ते से वापसी के लिए बेताब है। मानवता के मुकाबले राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरी है। जब डॉक्टर, इंजीनियर बिस्फोट करके देश को दहला सकते है तो बाकी संदिग्धों पर भरोसा करके देश की सुरक्षा को खतरे में नही डाला जा सकता। ये ममता की हिटलरशाही से भी बड़ी है।
ममता बैनर्जी ने पूरी तरह घुसपैठियों के बचाव में उतर अंतिम अस्त्र बीएसएफ की कार्य प्रणाली पर दाग केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
सनद रहे कि 22 सो km लम्बी
बंगला देश की सीमा में हर जगह बाड़ नही लगी है। जगह जगह सीमा खुली है। बाड़बंदी के लिए ममता ने बीएसएफ को जमीन ही नही दी। ताकि धुसपेथिये आराम से घुस डेमोग्राफी बदल सके। ममता अपने इस घातक इरादे में कामयाब रही। बंगाल के नादिया, मालदा,मुर्शिदाबाद जैसे 17 जिलो ओर झारखंड के 05 जिलो की डेमोग्राफी बदल चुकी है। वहाँ हिन्दू बहुसंख्यक से अलपसंख्यक हो चुके है। झारखंड में तो अनेक घुसपैठिये आदिवासी युवतियों से निकाह करके ग्राम प्रधान तक बन बैठे।अथाह सम्पति खरीद ली। सता के भाग्य योग्य साधन, सुविधाए जुटा ली।
ममता को ये मलाल है। वह हर तरह का वरदान देने के बाबजूद भगदड़ को रोक बीजेपी के आरोपो को बेबुनियाद बताने की बजाय खुद घुसपैठियों ने ममता के दावों की हवा निकाल दी। जिसका प्रभाव आसन्न विधान सभा चुनावों में पड़ना तय है।
ममता के एक तरफा, भेदभाव, तुष्टिकरण,धर्म विरोधी रवैये से आम सनातनी बहुत दुखी है। पीड़ित है। सनातानियो की जान,माल सुरक्षित नही है। आगजनी, मारपीट,बलात्कर आम है। दोषी यदि गैर हिन्दू है तो वह गुनाहगर होते हुए भी गुनाहगार नही है। ये है ममता बनर्जी का सत्ता को प्रकोप।
यदि चुनाव आयोग sir प्रभावशील करने में देर कर देता तो ममता सत्ता के लिए भारत को तोड़ भी सकती थी।
ये तय है।ममता बैनर्जी लाख कोशिशो के बाबजूद अब घुसपैठियों के डर को दूर नही कर सकती। राजी या गैर राजी से घुसपैठियो को भारत खाली करना ही होगा। घुसपैठिये समझ चुके है। बदलते भारत मे, भारत धर्मशाला नही रहा।