( श्याम चोरसिया)
मर्यादित,गरिमावन, शालीन भारतीय राजनीति का अपराधीकरण करने,जंगल राज के प्रेणता,वंशवाद की जड़े पुख्ता करने वाले चारा खाऊ लालू यादव के सोने का महल रोहणी आचार्य,तेज प्रताप ने ढाह असहाय लालू के मंसूबो पर पानी फेर दिया।
बिहार चुनाव बनाम पानीपत युद्ध मे घोर पराजय से मिले पारिवारिक, राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक नुकसान के पूरे परिणाम आने में वक्त लगेगा। मगर महल दरकने से परिणामो का श्रीगणेश हो चुका है।
रोहणी आचार्य ने दिए करारे झटके को भले ही बड़बोले तेजस्वी यादव बर्दास्त कर ले। मगर लालू और राबड़ी शायद ही बतदस्त कर पाए। आचार्य ने लालू पार्टी के सभी पदों से बकायदा किनारा कर लिया बल्कि तमाम पारिवारिक रिश्तों को तोड़ लिया। ये तय है। आचार्य के इतना कड़ा,शर्मनाक फैसला लेने से पूर्व घर मे जबरजस्त कलह भी हुई होगी। रोहणी की तार्किक बातों को तेजस्वी ने अपने हठीले स्वभाव के अनुस्सर खारिज करके आचार्य को आपे से बाहर कर दिया होगा। तेज प्रताप के मामले में भी यही नकारात्मक रवैया जिम्मेदार रहा था।
बीच चुनाव में तेजप्रताप यादव के लालू पार्टी के खिलाफ अलग बीन बजाने से तेजस्वी का तेज सिर्फ 26-27 सीटों पर ही दिखा। तेजस्वी को 2020 के चुनाव के मुकाबले 75 सीटों के हुए नुकसान से चुनाव का सारा गणित ही बिगड़ गया। तेजस्वी जिस घाट पर खड़े होकर pm मोदी और cm नीतीश बाबू को गरियाते फिर रहे थे। उस घाट को गंगा ने बहा दिया। अवशेष तक नही बचे। बंगाल की ममता की मुसीबतें बढ़ा दी।
तेज प्रताप सिंह भले ही हार गए हो। हारने के बाद वे तेजस्वी से ज्यादा तेज, सकारात्मक निकले। उन्होंने राष्ट्रवाद, कल्याण के यथार्थ को कबूल करते हुए pm मोदी और cm नीतीश की जोड़ी के देवत्व, पुरुषार्थ की भूरी भूरी तारीफ करके बिहार का विश्व कर्मा तक बता तमाम पराजितों को राह दिखा दी।
तेज प्रताप सिंह के हाथ ऊंचे करते ही भारत मे अपने भविष्य के लिए तमाम तरह की राष्ट्र विरोधीअपराध करके गंदगी फैलाने वाले अवैध रोहिंग्यो, बंगलादेशी घुसपैठियों में भारत से भागने की होड़ लग चुकी है।उंन्हे लग चुका है। उनके हिमायति बंगाल की ममता, बिहार के तेजस्वी में pm मोदी के बुलंद राष्ट्रीय अटल इरादों का मुकाबला करने की कूबत नही बची। तेजस्वी महल हारने कर बाद गढ़ी तक मे रहने योग्य नही बचे। शायद ये दुर्दशा तेजस्वी को तेज के राष्ट्रीय फैसले की दूरदृष्टि का भान करा दे।
तेज राष्टीय मुख्य धारा के मल्हा बन चुके है। रोहणी आचार्य ने अभी अपने पत्ते नही खोले है। शायद नारी मन राजनीति की फिसलन, लालच, अपनों की बलि लेने की जनून भरी फितरत से खट्टा हो जाए।
