(श्याम चोरसिया )
लगभग 01 सप्ताह चले भगोरिया पर्व उत्सव की मीठी यादे ले उमंग,उल्लास से लबरेज युवक- युवतियां अपने अपने फलिए,बस्ती में लौटने की होड लग गई। टेक्टर ट्रालियों, लोडिंग वाहनो में ठस युवक-युवतियां भगोरिया हाट बाजार को तज अपने दैनंदिनी कार्यो में लिप्त होने लौट गई। युवक कुछ दिन अपने अपने फलियों,बस्तियों में मौज मस्ती करने के बाद अपने कार्य स्थलों- गुजरात,आंध्र, महाराष्ट्र, राजस्थान और मप्र के बाकी हिस्सों में लौट जाएंगे।
सनद रहे। आदिवासी समाज के लिए भगोरिया पर्व उत्सव दीपावली से भी बड़ा और गतिमान पर्व है। ये पर्व उनकी सामाजिकता, हैसियत,रसूख का गवाह होता है। इस पर्व पर युवक-युवतियां खुल कर खर्च करते है। जम कर चांदी के आभूषण, अन्य श्रंगार सामग्री, इलेक्टानिक उपकरण खरीदते है। इस समय बेहतर किस्म के मोबाइल खरीदने की होड़ ने युवक युवतियां की जिंदगी ही बदल दी। उनकी मुट्ठी में दुनिया आ गयी।दूरियां खत्म सी हो गयी।
फलियों,बस्तियों में झोपड़ियां कही कही दिखती है। झोपड़ियों का स्थान पक्की छत वाले प्रधान मंत्री आवासों ने ले लिया है। इस आवासीय क्रांति ने आदिवासियों का राजनीतिक,सामाजिक, शेक्षणिक नजरिया ही बदल दिया।