
( जगदीश रघुवंशी )
भारत, सनातनियो के उल्लास, उमंग,तरंग के महापर्व होली दहन काल मे महिलाओं की भक्ति,आस्था, विश्वास चरम पर था। विधि विधान से शुभ मुहर्त में हुए होलिका दहन की बाट जोह रही श्रंगार से सजी धजी महिलाएं ने दहकती होली की परिक्रमा ले सुख,सम्रद्धि,आनंद, समरसता, सद्भाव की कामना की। दहकती होली भी महिलाओं के उधम,त्याग, तपस्या को देख मुस्करा उठी।
होली की ज्वाला की रंगत बदल गयी। बदलती रंगत से परिक्रमा रत महिलाओं को सकूं मिला।अदभुद सकूं। जैसे त्याग,तपस्या फलीभूत हो गयी हो।
122 सालों बाद चन्द्र ग्रहण की वजह से होलिका दहन के बाद धुलेंडी की गर्मी तुरन्त की बजाय 01 दिन खिसकांनी पड़ी। ज्योतिषों ने अपने अपने तर्को, गणित से निष्कर्ष निकाले। यानी धुलेंडी मंगलवार की बजाय बुधवार को ग्रहण उतरने के बाद में मनाई जाने की तैयारिया जोरो पर है। ज्योतिषों का मान रखने के लिए राज शासन ने भी मंगल के साथ बुधवार का अवकाश घोषित कर दिया। ताकि उमंग,उत्साह से रंग गुलाल खेली जा सके।
होली छिड़े भयानक युद्ध के विनास से अछूती लगती है।
