(श्याम चोरसिया)
बहुत प्रतिष्ठापूर्ण, कांटे के राज्य सभा की 11 सीटो के घोषित चोकाने वाले,अप्रत्याशित परिणामो ने जहाँ बीजेपी के कुशल प्रबधन, कला,नेतृत्व, प्रभाव, लोक छवि, लोकप्रियता उजागर किया वही लुटिया डुबाओ कारनामों ने राहुल की अलोकप्रियता, कुप्रबंध, लचर,राष्ट्र विरोधी नीतियों, कार्यप्रणाली की पोल खोल कर रख दी। बिहार, उड़ीसा में कांग्रेस अपने विधायको को बीजेपी के पक्ष में वोटिंग करने से नही रोक पाई। बिहार में छिन्न भिन्न कांग्रेस विहीप ही जारी नही कर सकी। नतीजन 06 में से 03 विधायकों के बगावती तेवरों के कारण महागठबंधन का उम्मीदवार चित्त होगया। बिहार की 05 में से 05 सीट बीजेपी /एनडीए कब्जाने में कामयाब रही। एनडीए को शिखर पर चढ़ाने में राहुल के 03 विधायकों का भी हाथ रहा। उनमें से एक गैर सनातनी फैसल रहमानभी है। इसी तरह से उड़ीसा में गैर सनातनी सोफिया फिरदौस है।
माना ये जाता है। गेर सनातनी बीजेपी से 36 का आंकड़ा रखते है। बीजेपी विरोधी महागठबन्धन में शामिल दल किसी हद तक यही मानते है। चाहे वह टीएमसी, उद्धव की शिवसेना ही क्यो न हो। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी का तो ये अटूट विश्वास है। हो भी क्यो न हो। कांग्रेस,समाजवादी पार्टियां गैर सनातनियो के समक्ष बीजेपी को दैत्य के रूप में प्रस्तुत करके डराती रही। मगर ये डर यूपी, बिहार,आसाम, मप्र, हरियाणा, जैसे अन्य बीजेपी शासित राज्यो के पार दर्शी, निष्पक्ष शासन ने दूर कर दिया। आसाम, यूपी में तो अधिकांश गैर सनातनी खुल कर बीजेपी की हिमायत में अपने कट्टर, तेजाबी नेताओ, मौलानाओं को ख़री ख़री सुना होश उड़ाने लगे। सबसे अनहोनी 40% गैर सनातनी आबादी वाले आसाम में हो रही है। महिलाएं खुलकर कांग्रेस की दुरंगी, राष्ट्र विरोधी नीतियों का विरोध करके बंगला देशी, रोहिंग्या घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़ने की मुहिम का समर्थन कर रही है। जाहिर महिलाएं बंगला देशी, रोहिग्या घुसपेठयो की नाजायज आपराधिक, गैर समाजिक हरकतों,आचरण से अजीज आ चुकी थी। वे ओर बर्दास्त करके समाज,देश को खोखला होते नही देख सकती थी।
तो क्या उड़ीसा की युवा चेतना की वाहक सोफिया फिरदौस ओर बिहार के फैसल रहमान जैसे विधायको ने कथित डर की आड़ में बोए जा रहे नफरत के जहर का बीजेपी के पक्ष में वोट करके करारा जबाब दिया? जबकि ये विधायक जानते है। उनकी इस बगावत के बदले उन्हें पार्टी से निकाला जाना तय है। विधायकी पर तलवार लटक सकती है। सदस्यता जा सकती है। लांछन लगा बदनाम किया जा सकता है। खतरे कम नही बल्कि ढेर है।
हार की हताशा को छिपाने के लिए महागठबंधन के राहुल ममता, तेजस्वी तो बीजेपी पर वोट खरीदने के आरोप लगा भी रही है। विधान सभा चुनाव में फंसी ममता तो बौखला सी गयी है। इसकी वजह साफ है। बिहार में फेसल रहमान ओर उड़ीसा में सोफिया फिरदौस के साहसिक फैसले का असर बंगाल के गैर सनातनियो में पड़ना तय है। ये दोनों सूबे बंगाल के पड़ोसी सूबे है। इससे ममता की संभावनाओं और गणित के साथ खेला हो सकता है। आसाम की तरह बंगाल भी अवैध घुसपैठियों की नापाक हरकतों से बुरी तरह त्रस्त है। इन घुसपैठियों के तांडव की वजह से ही बंगाल भीषण गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता से उभर नही पा रहा है। वोट के लालच में टीएमसी बनाम ममता ने इन्हें खुला संरक्षण दे रखा है। इसी बजह से ममता यूजीसी, यूसीसी का विरोध करके चुनाव आयोग की खिलाफत में भड़काऊ जहर उगलती रहती है।
उड़ीसा की सोफिया फिरदौस, बिहार के फैसल रहमान की बगावत से अनेक राजनीतिक समीकरणों को जन्म लेना तय है। बात दूर तक जाएगी। किले की प्रचीर हिल चुकी है। बुर्ज भी दरकेंगी। धधकती ज्वालाएं घर वापसी को नया आकाश दे सकती है। बनने वाले नए रिश्तों का अभिनंदन होगा। खास कर युवा ऊर्जा को दिशा, दृष्टि मिलेगी। इससे कट्टर जिहादियों का चिंतित होना लाजमी है। कट्टर जिहादियों को संरक्षण देने वाले नेताओं की जमीन भी खिसक सकती है। उन नेताओं का विश्वास डोल गया। अब कभी भी कुछ भी खेला हो सकता है। ये डर? सालता डर?? राष्ट्रीय हित मे ये डर अच्छा ही है।Τ