(श्याम चोरसिया )
मादल की थाप पर थिरकती निडर,निर्भीक आदिवासी सुंदरियों की तरंग,उमंग,उल्लास का आनंद लेने आदिवासी युवक ही नही बल्कि भगोरिया पर्व उत्सव की पवित्रता के दर्शन के इच्छुक पर्यटक भी इन दिनों रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, धार के अलावा राजस्थान के बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, गुजरात के दाहोद में आमद दर्ज करवा चुके है। होली तक इन जिलों के अलग अलग कस्बो में क्रमवार भगोरिया जत्सव हाट सज रही है।
हाट में हिस्सा ले अपने जोहर दिखाने की होड़ सी लगी हुई है। आदिवासी युवतियां सज-धज, पारम्परिक या आधुनिक परिधान पहन हाट की रौनक में चार चांद लगा देती है। हाट में आई दुकानों से खूब खरीददारी करती है। भले ही चांदी इन दिनों मगरी पर बैठी हो। मगर चांदी के नए आभूषण खरीदना और उनकी डोंडी पीटना पारिवारिक प्रतिष्ठा का हिस्सा है। इससे रुतबा जाहिर होता है। हाट में दूर दूर से दुकानदार आते है।चंद दिनों में लाखों का व्यापार कर लेते है। अभी यहां माल संस्कृति की दाल नही गल रही है।
महाराष्ट्र,गुजरात,मप्र, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, आंध्र आदि में चल रही विभिन्न विकास परियोजनाओं के सारथी आदिवासियों के वतन- वनांचल लौट जाने से इन परियोजनाओं की रफ्तार बहुत धीमी पड़ गयी। इनके वापस पटरी पर आने मेंकम से कम 20 दिन लग सकते है। इस दौरान आदिवासी समाज अपने गांव, फलिए में अपने परिजनों, रिस्तेदारो के साथ रिचार्ज होंगे। सुख-दुख,अनुनव बांटेंगे। तीर कमान का हुनर दिखाएंगे।
हाट में मादल की गूंज पर धीरे धीरे डीजे भी पैर पसारते दिखता है। पर आदिवासी युवकों की पहली पसंद मादल ही है। डीजे के खर्च वहन करने से आयोजक कतराते है।
पहले की तरह रिश्ते परिवार की झोपड़ी देख कर नही बल्कि अब युवक की आर्थिक कूबत,पद, प्रतिष्ठा देख कर तय होने लगे है। शिक्षा के प्रसार और महत्व के चलते अनेक प्रतिभावान आदिवासी युवतियां,युवक अधिकारी/कर्मचारी चयनित होकर विकास के वाहक बनते जा रहे है। नतीजन दिशा, सोच, विचार भी बदले है। दूरियां घट रही है। उच्च अधिकारी चयनित होने के बाद कुछ युवतियों ने सनातनी गैर आदिवासी समाज मे अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया। उन्होंने समरस होने में देर नही की। वजह। माना ये जारहा है। समाज मे उनके योग्य वर मिलने में कम से कम 05 साल और लग सकते है। युवतियों के मुकाबले युवक अभी प्रतिस्पर्धाओ मेंकम चयनित हो पा रहे है।इसके सीधे तार शिक्षा समर्पण से जुड़े है। युवक शहरी रंगीनियों में भागीदारी निभाने में कम ही परहेज दिखा पाते है।
भगोरिया के खुमार में सारा वनांचल डूब सा गया है।गजब की चहल पहल। सबसे सुंदर दिखने- दिखाने की होड़।
हर फलिए की चौपाल पर बुजुर्ग, अधेड़ हाट के इन्द्र धनुषी उल्लास का ऑपरेशन मरते मिल जाएंगे। खूब छक कर पी जाने वाली देशी दारू असर दिखा रही है।
महुआ फल आने-फलने में अभी कम से कम 20-25 दिन बाकी है। मगर पिछले साल का महुआ अब सोना साबित हो रहा है।