
( श्याम चोरसिया )
व्यापक जनाधार वाले लोकप्रिय, बेबाक,मुखर नेता राजा दिग्गविजय सिंह से पिंड छुड़ाने के लिए राहुल गांधी ने राज्यसभा के कपाट बंद कर दिए। नतीजन राजा पिछली बार की तरह उच्च सदन में आमद दर्ज कराने से वंचित रह गए।
1977 के बाद ये पहला मौका होगा जब राजा किसी भी सदन की शोभा नही बढ़ाएंगे। न विधान सभा न संसद।
राजा के उच्च सदन में न पहुचने से भले ही राजा को कोई फर्क न पड़े। पर कांग्रेस की राजनीतिक सेहत काफी प्रभावित होने के आसार लगते है। वजह। कांग्रेस के पास राजा जैसे बेबाक, तार्किक विश्लेषकों का घोर अभाव है। राजा को ही बीजेपी वक्ताओं का मुह बंद करने में महारत हासिल है। राजा की एक खासियत और भी है। वे वेणुगोपाल,राहुल गांधी,प्रियंका की तरह लकीर पीटने या फिजूल हल्ला मचा समय बर्बाद करने की बजाय सप्रमाण सत्तारूढ़ दल को घेरने में माहिर है। इन्ही खासियतों की वजह से राजा को राहुल पचा नही पाए। हा यदि अन्य नेताओं की तरह राजा भी राहुल के चरण चुम्बन लेते रहते तो राजा भी संघवी की तरह अनार पा जाते।
राजा के राज्य सभा मे पहुचने से कुछ समर्थक निराश है। असल मे इन समर्थकों को कवचं हटने का अंदेशा सत्ता रहा है। वे मानते है। मप्र कंग्रेस में राजा की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। कमलनाथ,गोविंद सिंह जैसे दिग्गजों से दो दो हाथ करने की क्षमता रखने वाले राजा की वाणी कमजोर पड़ सकती है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी सूतक में राजा को अंगूठा दिखा सकते है। संगठन की गति,लय में अंतर आ सकता है।
लगातार दो लोकसभा चुनाव- भोपाल और कर्मभूमि राजगढ़ से भारी अंतर से हारने के बाबजूद राजा की तीव्रता, ताजगी, सक्रियता में कमी नही आ सकी थी। इसमें उनकी बहुचर्चित नर्बदा परिक्रमा यात्रा का योगदान भी अहम रहा। प्रदेश कांग्रेस के पास राजा जैसा भीड़ जुटाउ नेता कोई दूसरा नही लगता। राजा को सुनने वालों की कमी नही है। जबकि प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की सभाए रंग नही जमा पाती। पंडाल भर नही पाता। कमल नाथ ने इन दिनों प्रदेश पूरी तरह जीतू पटवारी के हवाले कर रखा है। जीतू पटवारी कमलनाथ नही बल्कि राजा खेमे के माने जाते है। राजा के मंत्रों के बूते परवारी प्रदेश में बीजेपी की नीतियों और खेरातो से खाली कर दिए गए खजाने से मुकाबला करके कांग्रेस की खोई साख को बढ़ाने का हिमालयीन प्रयास कर रहे है।
ये तय है। राजा के चेले भले ही डटे रहे। मगर पद और रसूख के अभाव में वाणी की धार में दम कम हो जाए। बीजेपी भी यही चाहती है।
